बिहार की समृद्ध कला और संस्कृति को संरक्षित करने और बढ़ावा देने के लिए, उपेंद्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान और राज्य सरकार जैसे कई संगठन महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। पारंपरिक शिल्प, जैसे मधुबनी पेंटिंग, टिकुली कला, सिक्की शिल्प और पत्थर की नक्काशी, को एक नया मंच मिल रहा है।
डिजिटल प्लेटफॉर्म से नया आयाम
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बिहार के कलाकारों और शिल्पकारों को अपने उत्पादों को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने में मदद कर रहे हैं। ई-कॉमर्स पोर्टलों के माध्यम से, कोई भी व्यक्ति सीधे हस्तशिल्प उत्पादों को खरीद सकता है। यह न केवल इन कला रूपों को बढ़ावा देता है बल्कि कलाकारों और शिल्पकारों के लिए आय के नए अवसर भी खोलता है।
सरकार और संस्थानों के प्रयास
उद्योग विभाग और उपेंद्र महारथी शिल्प अनुसंधान संस्थान जैसे संगठन इस दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं। वे शिल्पकारों को प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रदान करते हैं, जिससे उन्हें अपने कौशल को निखारने और बाजार की मांगों के अनुसार उत्पादों को बनाने में मदद मिलती है।
हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम
उद्योग विभाग द्वारा संचालित छह महीने का नि:शुल्क हस्तशिल्प प्रशिक्षण कार्यक्रम एक महत्वपूर्ण पहल है। इसके तहत मधुबनी पेंटिंग, टिकुली कला, सिक्की शिल्प समेत 18 पारंपरिक कलाओं का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को वजीफा भी मिलता है, और पटना से बाहर के प्रशिक्षुओं के लिए छात्रावास और वित्तीय सहायता की व्यवस्था है।
भविष्य की संभावनाएं
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और सरकारी प्रयासों के संयोजन से, बिहार के हस्तशिल्प और लघु उद्योगों का भविष्य उज्ज्वल है। यह न केवल राज्य की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने में मदद करता है बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा देता है।

















