(समाज सेवा में 16 वर्षों से समर्पित)
आज का समाज एक विचलित मन:स्थिति से गुजर रहा है। घरों में संयुक्त परिवारों की जगह एकल जीवनशैली ने ले ली है, रिश्तों में अपनापन कम और दूरी ज़्यादा महसूस होती है। हम तकनीक से जुड़ तो गए हैं, पर दिलों से टूटते जा रहे हैं। हाल की “सोनम जैसी घटनाएं” केवल एक अलार्म नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक चेतना को झकझोरने वाली वास्तविकताएं हैं। ऐसे में सवाल उठता है — क्या समाधान है हमारे टूटते समाज का? क्या योग मात्र शरीर को लचीला बनाने का अभ्यास है या कोई गहराई भी है इसमें?
योग: केवल अभ्यास नहीं, जीवन की दिशा है
योग न केवल एक शारीरिक क्रिया है, बल्कि एक मानसिक, सामाजिक और आत्मिक साधना भी है। पतंजलि योग सूत्र कहता है:
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” — योग चित्त की वृत्तियों का निरोध है।
इसका अर्थ है कि जब मन की चंचलता शांत होती है, तब जीवन में स्पष्टता, समत्व और करुणा का संचार होता है।
जब हम ‘समत्व’ की बात करते हैं, तो वह केवल मानसिक संतुलन की नहीं, बल्कि रिश्तों, समाज और संस्कृति में संतुलन की भी बात है। योग यही सिखाता है कि हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखें, न क्रोध में बहें, न दुःख में डूबें।
वसुधैव कुटुम्बकम: योग की आत्मा
“वसुधैव कुटुंबकम” का सिद्धांत — पूरा विश्व ही मेरा परिवार है — केवल एक दार्शनिक विचार नहीं, यह योग की आत्मा है।
जब हम योग के माध्यम से अपने भीतर प्रेम, क्षमा और सहिष्णुता को जगाते हैं, तब वही भाव बाहर समाज में फैलते हैं।
आज पश्चिमी संस्कृति ने भारतीय मूल्यों को चुनौती दी है — परंतु योग पश्चिम को भी दिशा दे रहा है। अमेरिका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया — हर जगह योग केवल एक व्यायाम नहीं, एक जीवन दर्शन बन गया है।
तो फिर, हम भारतीय क्यों न अपनी इस अमूल्य धरोहर को अपनाएं?
समाज की टूटती कड़ियों को जोड़ता है योग
संयुक्त परिवारों का टूटना केवल पीढ़ियों के अंतर का परिणाम नहीं, संवाद के अभाव का दुष्परिणाम है।
योग मौन में संवाद करना सिखाता है, श्वास में समाधान ढूँढना सिखाता है, अंतर में शांति पाना सिखाता है।
जब घर के प्रत्येक सदस्य को योग से जोड़ा जाए — चाहे वह ध्यान हो, प्राणायाम हो या केवल सुबह की 10 मिनट की शांति साधना — तब घरों में हिंसा नहीं, वात्सल्य बढ़ेगा।
समाज को दिशा देता योग
मेरे 16 वर्षों के अनुभव में, मैंने देखा है कि जहाँ योग है, वहाँ संयम है; जहाँ संयम है, वहाँ संबंध हैं; और जहाँ संबंध हैं, वहाँ समाज सशक्त है। मैंने योग के चमत्कार को आँखों से देखा हैँ, हजारों परिवार योग से जुड़ते देखे हैँ, वैसे भी अष्टांग योग की पहली ही सीढ़ी यम सामाजिक स्वास्थ्य को समर्पित हैँ, अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्राह्मचर्य और अपरिग्रह की आवश्यकता आज से ज्यादा कभी नहीं थी।
सोनम जैसी घटनाएं केवल कानून से नहीं, संस्कार से रुकेंगी — और वह संस्कार योग से ही आएगा।
निष्कर्ष
आज आवश्यकता है कि हम अपने बच्चों को योग के साथ जीना सिखाएं, परिवार में सामूहिक योग की परंपरा शुरू करें, और हर गली-मोहल्ले में योग को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं।
क्योंकि योग केवल व्यायाम नहीं, वह संस्कृति है।
योग केवल साधना नहीं, वह समाधान है।
योग केवल शरीर का बल नहीं, समाज का बल है।
योग गुरु काजल चौधरी
समाज सेवा, योग शिक्षा और भारतीय संस्कृति के प्रचार में 16 वर्षों से समर्पित
योग गुरु और संस्थापक
BYC fitness foundation
काजल चौधरी
www.bycfitness.com

















