नरकटियागंज सीट पर रश्मि वर्मा का जलवा कायम रहेगा या नहीं,

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Will Rashmi Verma's dominance remain on Narkatiaganj seat or not?

Narkatiaganj Assembly Seat:नरकटियागंज सीट पर रश्मि वर्मा का जलवा कायम रहेगा या नहीं, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा। यहाँ कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं जो इस पर असर डाल सकती हैं:

मजबूत राजनीतिक पृष्ठभूमि:

  • रश्मि वर्मा ने 2014 में उपचुनाव जीतकर पहली बार नरकटियागंज सीट से विधायक बनी थीं।
  • 2015 में बीजेपी से टिकट न मिलने के बाद उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा था, जिसमें वो तीसरे स्थान पर रहीं थीं।
  • 2020 में बीजेपी ने उन्हें फिर से टिकट दिया, जिसमें उन्होंने अपने जेठ विनय वर्मा को हराकर जीत हासिल की। यह दर्शाता है कि उनका राजनीतिक आधार और चुनावी अनुभव मजबूत है।

पार्टी के भीतर चुनौतियाँ:

  • हाल के समय में, रश्मि वर्मा को पार्टी के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं के विरोध का सामना करना पड़ा है।
  • उनके खिलाफ निंदा प्रस्ताव पारित करने और उन्हें फिर से टिकट न देने की मांग की खबरें भी सामने आई हैं, जो उनके लिए एक चुनौती हो सकती है।
  • ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें उनकी व्यक्तिगत तस्वीरें वायरल हुईं और उन्होंने इसे बदनाम करने की साजिश बताया। इस तरह के विवाद चुनाव में उनकी छवि पर असर डाल सकते हैं।

चुनावी समीकरण:

  • नरकटियागंज सीट पर पारंपरिक रूप से बीजेपी और कांग्रेस के बीच मुख्य मुकाबला रहा है।
  • मुस्लिम मतदाताओं की संख्या और उनके वोटिंग पैटर्न भी निर्णायक हो सकते हैं।
  • अगर मुस्लिम वोट एकजुट हो जाते हैं तो यह चुनाव को और भी दिलचस्प बना सकता है।
  • इसके अलावा, स्थानीय मुद्दे जैसे पानी निकासी और रोजगार भी आगामी चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

कुल मिलाकर, रश्मि वर्मा का राजनीतिक अनुभव और पार्टी के भीतर उनका मजबूत समर्थन उनके पक्ष में है, लेकिन पार्टी के भीतर का विरोध, व्यक्तिगत विवाद और बदलते चुनावी समीकरण उनके लिए चुनौती भी खड़ी कर सकते हैं। यह कहा जा सकता है कि आने वाले चुनाव में नरकटियागंज सीट पर कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है।

बिहार के दो सौ 43 विधानसभा सीटों में से एक नरकटियागंज विधानसभा सीट क्रम संख्या में तीसरे नंबर पर है। पश्चिम चंपारण जिले में स्थित यह विधानसभा क्षेत्र वाल्मीकि नगर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आता है। बता दें कि परिसीमन के बाद साल 2008 में यह विधानसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया और साल 2010 में इस सीट पर हुए चुनाव में बीजेपी के सतीश चंद्र दुबे विधायक चुने गए थे। इसके बाद 2014 में हुए उपचुनाव में भी इस सीट पर बीजेपी का ही कब्जा रहा और रश्मि वर्मा विधायक चुनी गईं। रश्मि वर्मा नरकटियागंज की मेयर भी रह चुकी थी। हालांकि 2015 में इस सीट को बीजेपी बचाने में कामयाब नहीं हो पाई और कांग्रेस के विनय वर्मा विधायक चुने गए, लेकिन 2020 के चुनाव में रश्मि वर्मा ने जीत हासिल की थी। इस बार भी बीजेपी यहां से रश्मि वर्मा को चुनावी रण में उतार सकती है।

वहीं, 2015 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर कांग्रेस के विनय वर्मा ने बीजेपी की रेणु देवी को 16 हजार 61 वोटों से हराया। विनय वर्मा को कुल 57 हजार दो सौ 12 वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर पर रही रेणु देवी को कुल 41 हजार एक सौ 51 वोट मिले थे तो वहीं तीसरे स्थान पर रहे निर्दलीय रश्मि वर्मा को 39 हजार दो सौ वोट मिले थे।

वहीं, 2014 में हुए विधानसभा उपचुनाव में परिणामों पर नजर डालें तो…बीजेपी की रश्मि वर्मा ने कांग्रेस के फखरुद्दीन खान को 15 हजार सात सौ 42 वोटों से हराया और विधायक चुनी गईं। रश्मि वर्मा को कुल 64 हजार छह सौ दो वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर पर रहे फखरुद्दीन खान को कुल 48 हजार आठ सौ 60 वोट मिले थे तो वहीं तीसरे स्थान पर रहे जेपीएस के रामभजु महतो को मात्र 3 हजार सात सौ 69 वोट मिले थे।

वहीं, 2010 में हुए विधानसभा चुनाव परिणामों पर नजर डालें तो…बीजेपी के सतीश चंद्र दुबे ने कांग्रेस के आलोक प्रसाद वर्मा को 20 हजार दो सौ 28 वोटों से हराया और विधायक बने। सतीश चंद्र दुबे को कुल 45 हजार 22 वोट मिले थे, जबकि दूसरे नंबर पर रहे आलोक प्रसाद वर्मा को कुल 24 हजार सात सौ 94 वोट मिले थे तो वहीं तीसरे स्थान पर रहे निर्दलीय फखरुद्दीन खान को कुल 22 हजार तीन सौ 81 वोट मिले थे।नरकटियागंज विधानसभा सीट पर इस बार भी बीजेपी और कांग्रेस में कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है।

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